शिवनाथ बेसिन में मेहर जाति की सांस्कृतिक दशाएंॅ

 

 

ज़ेड. टी. खान  एवं सी. आर. रात्रे

 

भूगोल अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़

 

 

प्रस्तावनारू

सामाजिक संरचना में जाति का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक मानव समूह अपनी परंपराओं, जीवन-शैली एवं क्रिया-कलापों के आधार पर एक विशिष्ट  संस्कृति को धारण करता है। जातीय समूह के रहन-सहन में उसकी संस्कृति स्पष्ट परिलक्षित होती है मेहर छत्तीसगढ़ की एक अनुसूचित जाति है। ग्रामीण समाज व्यवस्था पौनी-पसारी में से एक “मेहर“ मैदानी भागों के गांवों में तीन या चार परिवारों के औसत में निवास करते हैं।

 

उद्देश्यरू

सामाजिक संरचना में मेहर जाति का स्थान निम्नतम है इसलिए मेहर जाति की सांस्कृतिक दशाओं का अध्ययन शोध का मुख्य उदद्ेश्य है।

 

आंकड़ों का संकलन एवं विधितंत्ररू

प्रस्तुत अध्ययन सर्वेक्षण से प्राप्त प्राथमिक आंकड़ों व्यक्तिगत चर्चा एवं अनुभवों पर आधारित है। अध्ययन के लिए बेसिन के 13 विकास खंडों से सोद्देश्य निदर्शन विधि द्वारा कुल 13 गांवों का चयन किया गया है। चयनित 13 गांवों में से मात्र 8 गांवों में ही मेहर जाति पाई गई है। चयनित गांवों में निवासरत मेहर परिवारों का 2004 में जनगणना सर्वेक्षण किया गया है, तथा सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ो का सारणीयन कर विश्लेषण किया गया है। विश्लेषण हेतु प्रतिशतांक विधि का सहारा लिया गया है।

 

अध्ययन क्षेत्ररू

अध्ययन क्षेत्र शिवनाथ बेसिन छत्तीसगढ़ राज्य के मध्य-पश्चिम भाग में 20.7श् से 22 .31श् उत्तरी अक्षांश एवं 80 23श् से 81 .58श् पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है। यह बेसिन छत्तीसगढ़ मैदान का ही भाग है यहाॅं की प्रमुख नदी शिवनाथ है जो महानदी की प्रमुख सहायक नदी है। इसकी उत्तर से दक्षिण अधिकतम लम्बाई 267.3 किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम चैड़ाई 122.4 किलोमीटर है। बेसिन का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल22366.12 वर्ग किलोमीटर है। प्रशासनिक दृष्टि से शिवनाथ बेसिन 3 जिलों, दुर्ग,राजनांदगांव एवं कवर्धा, 21 तहसीलों एवं 25 विकासखण्डों में विभक्त है। वर्ष 2001 की जनगणना अनुसार यहाॅं की जनसंख्या 46,78,212 है, जो छत्तीसगढ़ की कुल जनसंख्या का 4.45 प्रतिशत है। जनसंख्या में लिंगानुपात 996 है। बेसिन में अनुसूचित जाति की कुल जनसंख्या 5,61,286 है जो कुल जनसंख्या का 12 प्रतिशत है।

 

अध्ययन इकाईरू

मेहर जाति की आर्थिक स्थिति के अध्ययन के लिए विकासखण्डवार चयनित ग्राम में से मेहर परिवारों को इकाई माना गया है।

 

सांस्कृतिक दशाएंॅरू

ग्रामीण समाज व्यवस्था पौनी-पसारी जातियों में से एक “मेहर जाति“ बेसिन के मैदानी भागों के गांवों में तीन या चार परिवारों के औसत में निवास करते हैं। मेहर गांवों में परंपरागत चर्म व्यवसाय से जुड़ी हुई जाति है। मेहर पुरूष कृषि उपयोगी चमड़े का सामान बनाना तथा महिलाएॅं दाई का कार्य करतीं हैं। कार्य के बदले में इन्हें अनाज दिया जाता था जिसे जेवर कहा जाता था तथा इन्हें मेहर पद प्रदान किया गया था (हीरालाल एण्ड रसेल 1916) संभवतः इसी अधार पर इनका मेहर नाम पड़ा है। जनसंख्या की दृष्टि से यह सतनामी के बाद दूसरे क्रम की जाति है। सर्वेक्षित 8 गांवों में 60 परिवार पाई गई। इनकी कुल जनसंख्या 357 है,जिसमे 178 पुरूष एवं 179 महिलाएॅं है। शिवनाथ बेसिन में मेहर जाति की सांस्कृतिक दशाओं के अंतर्गत निवास स्थान, आवासीय दशाएंॅ, परिवार के आकार एवं प्रकार, विवाह, नातेदारी, रीति रिवाज, खानपान की आदतें, वस्त्र एवं आभूषण, सामाजिक स्थिति, आधुनिक जीवनोपयोगी साधनों का उपयोग, एवं व्यावसायिक संरचना का अध्ययन किया गया है।

 

निवास स्थानरू

सर्वेक्षित ग्रामों में मेहर जाति का निवास स्थान गांॅव के बाहरी भागों में गौण मार्गों पर स्थित थे। इनके निवास स्थल से सटा हुआ अन्य अनुसूचित जातियों के निवास स्थित थे, जो गैर अनुसूचित जातियों की तुलना में  मेहर जाति से अपनत्व या कम अस्पृश्यता का भाव रखते हैं। इसके पश्चात अन्य जातियों की जनसंख्या निवास कर रहे थे। किंतु इनके निवास स्थलों के मध्य स्थित गली या मार्ग जातीय दृष्टि से मेहर को गांॅव से पृथक करने का कार्य कर रहे थे।

 

 

आवासरू

मनुष्य जीवन में शरीर की सत्ता बनाए रखने के लिए तीन जैविक आवश्यकताएंॅ-रोटी, कपड़ा और मकान है। मकान या मानव-आवास सांस्कृतिक भू-दृश्य का एक महत्वपूण तत्व है जिसका वितरण भू-पृष्ठ के उस समूचे भाग पर पाया जाता है जो मानव जाति की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक क्रियाओं से प्रभावित होता है। चंूकि आवासों का निर्माण मानव बसाव अथवा आद्य भू-दृश्य के मानवीयकरण के दौरान होता है, इनके अध्ययन से किसी क्षेत्र के निवासियों के सामाजिक एवं आर्थिक स्तर को जाना जा सकता है। तथा आवासों के सूक्ष्म विश्लेषण से आवासियों में समृद्वि, जीवनस्तर, स्वास्थ्य, जीवन की गुणवत्ता आदि के संबंध में जानकारी मिल सकती है।

 

मकानों के आकाररू

मकानो के आकार से तात्पर्य निर्मित भूखण्ड के औसत आकार से है। इसके अध्ययन के लिए सर्वेक्षित परिवारों के मकानों को निर्मित क्षेत्रफल के आधार पर पांॅच वर्गों में विभक्त किया गया है-1. 250 वर्गफुट से कम, 2. 250 से 500 वर्गफुट, 3. 500 से 750 वर्गफुट, 4. 750 से 1000 वर्गफुट एवं 5. 1000 वर्गफुट से अधिक उक्त आधार पर 28.33 प्रतिशत के मकान 250 वर्गफुट से कम क्षेत्रफल पर निर्मित हैं। 53.34 प्रतिशत के 250 से 500 वर्गफुट, 8.33 प्रतिशत के 500 से 750 वर्गफुट एवं 10 प्रतिशत के मकान 750 से 1000 वर्गफुट क्षे़त्रफल पर निर्मित है। इनमें 1000 वर्गफुट से अधिक क्षेत्रफल वाले मकानधारकों का प्रतिशत शून्य है।

 

मकानों के प्रकाररू

मकानों के प्रकार से तात्पर्य मकानों की रचनात्मक स्थिति तथा विकास से है। मकानों का निर्माण जिन सामाग्रियों से तथा जिस प्रकार से होता है, उसके आधार पर मकानों की रचनात्मक स्थिति का निर्धारण किया जा सकता है। सर्वेक्षित परिवारों के मकान निर्माण के उपयोग में लाई गई सामाग्रियों के आधार पर मकानों का वर्गीकरण चार प्रकार में किया गया है यथा-झोपड़ी, कच्चा, अर्धपक्का एवं पक्का। अध्ययन क्षेत्र में इनके 85 प्रतिशत परिवारों के मकान कच्चे हैं। शेष 6.67 प्रतिशत अद्र्वपक्का एवं 8.33 प्रतिशत पक्का है। इनके 90 प्रतिशत मकानों के छत खपरेल के हैं। सर्वेक्षित 15 प्रतिशत परिवारों के मकान एक कमरे के हैं जिसमे बरामदा संलग्न है।

 

परिवार के आकार एवं प्रकाररू

प्राचीन काल में कृषि अर्थव्यवस्था के कारण परिवार अपेक्षाकृत वृहत आकार के होते थे। परंतु वर्तमान समय में परिवार के आकार में निरंतर कमी होती जा रही है। सर्वेक्षित मेहर परिवारों का औसत आकार 5.95 सदस्य है। इनके 11.67 प्रतिशत परिवारों मे 9 से अधिक सदस्य संख्या पायी गई है।

 

प्रकार की दृष्टि से परिवार को  दो भागों संयुक्त एवं एकाकी में बांटा जाता है। संयुक्त परिवार वे परिवार हैं,जिसमें दादा-दादी, माता-पिता, पुत्र और पौत्र सांथ रहते हैं। अध्ययन में संयुक्त परिवार का जो स्वरूप सामने आया उसमे आमतौर पर एक पीढ़ी साथ पहती है तथा वृद्व को सहारा मिलता है। इनमें 31.67 प्रतिशत परिवार संयुक्त है। एकाकी परिवार में पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चे साथ रहते हैं। सर्वेक्षित परिवारों में 68.33 प्रतिशत परिवार एकाकी है।

 

विवाहरू

विवाह एक संस्कार है जो स्त्री पुरूषों को स्थायी पारिवारिक जीवन व्यतीत करने की अनुमति प्रदान करता है। इसे आवश्यक सामाजिक एवं धार्मिक कृत्य समझा जाता है। सर्वेक्षित मेहर परिवारों में 9.38 प्रतिशत महिलाएंॅ 15 वर्ष से कम आयु में विवाहित हुई है। 21 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में विवाहित महिलाओं का प्रतिशत 4.38 है। इनमें 26.33 प्रतिशत महिलाएंॅ तथा 23.81 प्रतिशत पुरूष अविवाहित हैं। विवाहित महिला एवं पुरूषों का प्रतिशत क्रमशः 22.13  एवं 22.69 है। इनमें 3.36 प्रतिशत पुरूष विधुर हैं। मेहर मे पृथक की प्रवृत्ति भी पायी गई थी।

 

मेहर मे अंतर्जातीय विवाह निषेध है तथा चूड़ीप्रथा या पुनर्विवाह प्रचलित है। परंपरागत विवाह संबंधों में वर एवं कन्या पक्ष परस्पर परिचित होकर गोत्रादि की जानकारी लेते हैं। लड़के के माता-पिता यदि लड़की देखना चाहें तो उन्हें लड़की दिखा दी जाती है। इसी तरह यदि कन्या पक्ष के लोग लड़के को देखना चाहंे तो उन्हें भी अवसर दिया जाता है। तत्पश्चात सर्वप्रथम पांॅच पंच मिलकर मंगनी की रस्म पूरी करते हैं, और सगाई का दिन निश्चित करते हैं। इसे माहला या फलदान कहा जाता है। विवाह प्रायःचैत्र रामनवमी एवं अक्षय तृतीया के दिन सम्पन्न किया जाता है, जिसमें तेल चुलमाटी , मायन, बारात, परघौनी, कन्यादान,भांवर, टिकावन, विदाई, नहडोरी आदि प्रमुख है। विवाह मे तीन तेल की प्रथा है। किंतु कुछ गोत्रों में पांॅच तेल चढ़ाते हैं। विवाह के बाद दुल्हन को वर पक्ष के साथ विदा कर दिया जाता है लेकिन ससुराल में मात्र एक या दो दिन ठहरने के बाद कन्या पुनः अपने पिता के घर वापस जाती है। कन्या के घर वापसी को  मेहर में चैथिया बारात (कन्या पक्ष की ओर से वर के घर जाते हैं) कहा जाता है।  कन्या गौना रस्म के बाद ही स्थायी रूप से अपने ससुराल में जाती है। मेहर जाति में अशिक्षा, गरीबी, एवं पिछड़ेपन के कारण बाल विवाह प्रचलित थे। अध्ययन से स्पष्ट है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बाल्यकाल में परम्परागत विवाह की प्रथा प्रचलित है, किन्तु शिक्षा का स्तर धीरे-धीरे उॅंचा होने से यह प्रथा अब कम होती जा रही है। मेहर जाति में विधवा विवाह की प्रथा प्रचलित है। यदि विवाह के बाद स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती है तो उसे उसका देवर विवाह कर लेता है, वैसे वह अन्यत्र विवाह के लिए पूर्ण स्वतंत्र होती है। इस प्रकार के विवाह में देवर या अन्य वर करसा (मटका) पर्रा या कटार के साथ फेरे लेकर विधवा स्त्री के हाथ में चूड़ी पहनाता है। प्रायः विधवा विवाह में स्त्री पुरूष के बीच के आयु के अंतर को ध्यान में नहीं रखा जाता है।

 

मेहर जाति में विवाह बन्धन काफी शिथिल है। कोई स़्त्री पति से अनबन होने पर उसे छोड़ देती है तथा किसी दूसरे पुरूष के साथ घर बसा लेती है। इसी प्रकार कोई पुरूष एक पत्नी को छोड़ दूसरे स्त्री के साथ घर बसा लेता है। इसके लिए उसे चूड़ी पहनाकर पत्नि बनाया जाता है। चूड़ी पहनने वाली महिला को नये साड़ी, सुहाग की वस्तुएंॅ देना पड़ता है। इस प्रकार के विवाह में पूर्व पति को स्थायी पत्नी के सुख से वंचित होने तथा विवाह के खर्च की क्षतिपूर्ति के रूप में दूसरे पति के हैसियत के अनुसार राशि पंचों द्वारा अथवा आपसी सहमति से तय कर देना पड़ता है। इसे बिहाती कहते हैं। मेहर जाति अपने रक्त सम्बंधियों के बीच विभिन्न जातिय समूह वहिर्विवाह नियमों का दृढ़ता पूर्वक पालन करते हंै। मेर में ममेरा-फूफेरा भाई-बहनों के बीच वैवाहिक सम्बंध निषिद्ध माने जाते है। मेहर जाति में बहुपत्नी प्रथा प्रचलित है। एक पुरूष एक साथ एक से अधिक पत्नियाॅं रख सकती है। विवाहित पत्नी का दर्जा प्रमुख पत्नी का होता है। चूड़ी वाली पत्नी को द्वितीय पत्नी का दर्जा होता है।

 

नातेदारीरू

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अतः जन्म से लेकर मृत्यु तक वह अनेक व्यक्तियों से घिरा होता है परन्तु इनमें से सबसे महत्वपूर्ण संबंध उन व्यक्तियों के साथ होता है जो कि विवाह बंधन और रक्त संबंध के आधार पर संबंधित है।

 

विवाह संबंधी नातेदारीरू

इसमें वहीं नातेदार लोग आते हैं, जो सीधे विवाह संबंध से जुड़ते हैं जैसे- साला-साली, साला-बहनोई, सास-दामाद, ससुर-दामाद, साली-जीजा, देवर-भामी, सास-बहू, ननंद-भौजाई, जेठ-जेठानी आदि।

 

रक्त संबंधी नातेदारीरू

इसमें वही नातेदार लोग आते हैं जो कि समान रक्त के आधार पर एक दूसरे से संबंधित हों। जैसे माता-पिता एवं उनके बच्चों के बीच अथवा दो भाईयों के बीच का संबंध, काका, भतीजे एवं उनकी पत्नियाॅं। मेहर जाति में व्याहता स्त्री से रक्त संबंध होते हुए भी उन्हे उसी गोत्र की मानते हैं। विवाह से ही उसको रक्त संबंधी मान लिया जाता है, वे कुटुम्ब के लोग कहलाते है।

 

रीति-रिवाजरू

मेहर जाति में बच्चों के जन्म के बाद छठवें दिन छठीं मनाई जाती है, जिसमें मुण्डन संस्कार होता है। इस अवसर पर सामूहिक भोज होते हैं। विवाह के लिए प्रस्ताव दूल्हे के पक्ष से किया जाता है, तथा दहेज पूर्णतः निषिद्ध है। सतीप्रथा निषेध है। मृत्यु संस्कार में शव को जलाते है। जलाने के पूर्व शव के मुख में पवित्र जल डाला जाता है।

 

खान-पानरू

शिवनाथ बेसिन धान की कृषि के लिये उपयुक्त है अतः धान यहां की मुख्य खाद्य फसल है, इसलिये मेहर जाति चांवल, को मुख्य आहार के रूप में उपभोग में लाते हैं। किन्तु गेहूॅं, चना, दाल का भी उपयोग करते है। मेहर जाति शाकाहारी एवं मासांहारी दोनों है। किन्तु यह इच्छा अनुसार है। कुछ लोग मंदिरा का सेेवन भी करते हैं। कुछ लोग बीड़ी का भी सेवन करते हैं जबकि तम्बाकू का सेवन पुरूष और स्त्री दोनों द्वारा किया जाता है।

 

वस्त्र एवं आभूषणरू

वर्तमान में वस्त्र एवं आभूशण में एक रूपता गई है। सर्वेक्षित गांवों में पुरूष वर्ग धोती, कुर्ता, कमीज, लुंगी बनियान अंगौछी आदि जबकि स्त्री वर्ग-साड़ी, साया ब्लाउज आदि वस्त्र उपयोग में ला रहे है। नवीनतम वेषभूषा में युवावर्ग में परिवर्तन आया है। युवा पुरूष अब रेडीमेंड वस्त्र पेन्ट, शर्ट पजामा, कुर्ता आदि का उपयोग कर रहे हैं जबकि युवतियाॅं सलवार कुर्ता, आदि का उपयोग कर रही है। ये वस्त्र सूती एवं टेरीकाट दोनों के होते है।

 

वर्तमान समय में फैशन के साथ आभूषणों के व्यवहार एवं बनावट में भी परिवर्तन गया है। पैरों में पहने जाने वाले आभूषण जैसे चूरा, पैरी, हाथों में पहूंची एंेठी ककनी गले में सुतिया रूपिया (हेवाल) वर्तमान में प्रायः नई बनावट के आभूषण उपयोग में लाये जा रहे हैै। जैसे

पैरों में - पायजेब, बिछिया आदि।

हाथों में - चूड़िया, कड़े, अंगूठी, छल्ला आदि।

गले में - माला, डोरला, चैन मंगलसूत्र हार आदि।

नाक में - नथनी फूली।

कानों में - टाप्स (खुंटी), झमका, बाली आदि।

उक्त आभूषण आर्थिक स्थिति के अनुसार सोने चांदी या अन्य धातुओं के व्यवहार में लाये जाते हैै।

 

पर्व एवं उत्सवरू

मेहर जाति अपने को हिन्दू धर्मावलम्बी मानते हैं हिन्दु धर्म के अंतर्गत प्रचालित पर्व हरेली (हरियाली) रक्षाबंधन, जन्मांष्टमी, तीजा-पोला, गणेष चतुर्थी, दशहरा, दीपावली, होली, रामनवमी, आदि त्यौहारों को ये लोग बड़े धूमधाम से मनाते हैं इसके अपने देवी देवता है। मेहर में जवारा की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। मेहर संतशिरोमणी रविदास की पूजा करते है।

 

सामाजिक दशाएंॅरू

मेहर पुरूष पारंपरिक रूप से कृषि उपयोगी चमड़े का कार्य तथा महिलाएॅं दाई का कार्य करती हैं इसके कारण सामाजिक दृष्टि से गांवों मे आज भी इनसे अस्पृष्यता का व्यवहार किया जाता है।

 

आधुनिक जीवनोपयोगी साधनों का उपयोगरू

बेसिन में पहले समय में परम्परागत जीवनोपयोगी साधन हुआ करते थे। जिनका चलन अब कम हो गया है। आधुनिक बर्तन गंज, हउला, बाल्टी, भगौना, भगौनिया, थाली.कटोरी, लोटा-गिलास, कुकर, जग, प्याला, चम्मच आदि में उपयोग में लागे लगे हैं। ये आवश्यकता एवं आर्थिक स्थिति के आधार पर कांसा, पीतल, स्टील, जर्मन प्लास्टिक से निर्मित होते है। आर्थिक रूप से पिछड़ेपन के कारण इनके घरों में अन्य आधुनिक साजों समान या उपकरण नही ंके बराबर होते थें, किंतु संवैधानिक व्यवस्थाओं, विज्ञान तकनीकी विकास के कारण अब अनेक नवीन उपकरण व्यवहार में लाये जा रहे है। जैसे घड़ी, पंखा, रेडियो टेपरिकार्डर, टेलीविजन, सी.डी. प्लेकर, स्टोव, कुर्सी, सोफा-पलंग, सिलाई मषीन, आलमारी, बिजली का आयरन, सायकल, स्कूटर एवं मोटर सायकल आदि। सर्वेक्षित परिवारों मे 4.80 प्रतिशत के पास सायकल, 0.78 प्रतिशत के पास मोटरसायकल, 1.92 प्रतिशत के पास रेडियो एवं 1.80 प्रतिशत परिवारों के पास टी.वी.उपलब्ध है।

 

व्यावसायिक संरचनारू

सर्वेक्षित परिवारों की जनसंख्या में मुख्य कार्यशील जनसंख्या को चार प्रमुख व्यवसायों के अंतर्गत रखा गया है सारिणी-1

 

सारिणी-1रू मेहर जाति: व्यावसायिक संरचना, 2004

क्रमांक      व्यवसाय    परिवार (प्रतिशत में)

1     काश्तकार    39.91

2     खेतिहर मजदूर     29.81

3     पारिवारिक उद्योक 15.14

4     अन्य व्यवसाय     15.14

5     बेसिन 100

 

काश्तकाररू

काश्तकार वह व्यक्ति है जो अपनी स्वयं की भूमि पर अथवा सरकार या दूसरे व्यक्ति या संस्था की भूमि पर जिन्स या बटाई पर अथवा अकेले या पारिवारिक काम करने वाले के रूप में कार्य करता है। इनमें कुल कार्यशील जनसंख्या का 39.91 प्रतिशत काश्तकार हैं।

 

खेतिहर मजदूररू

जो व्यक्ति नकद,जिन्स या बटाई के रूप में मजदूरी लेकर किसी दूसरे व्यक्ति के खेत में कार्य करता है,वह खेतिहर मजदूर है। सारिणी से स्पष्ट है कि मेहर जाति में व्यावसायिक संरचना, की दृष्टि से 29.81 प्रतिशत जनसंख्या खेतिहर मजदूर का कार्य करते हैं।

 

पारिवारिक उद्योगरू

पारिवारिक उद्योक वह उद्योग है जो परिवार के मुखिया द्वारा स्वयं अथवा परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में घर या गांव की सीमा के अन्दर अथवा उस मकान के अहाते में जिसमें परिवार रहता है, चलाया जाता है। बेसिन में कुल कार्यशील जनसंख्या का 15.14 प्रतिशत पारिवारिक उद्योग में संलग्न है।

 

अन्य कार्यरू

बेसिन में काश्तकार, खेतिहर मजदूर एवं पारिवारिक उद्योगों में संलग्न जनसंख्या को छोड़ कर समस्त कार्यों में संलग्न जनसंख्या को अन्य कार्य करने वालों में शामिल किया गया है। बेसिन में कुल कार्यशील जनसंख्या का 15.14 प्रतिशत अन्य कार्यों में संलग्न है।                      

निष्कर्षरू

अध्ययन से स्पष्ट है कि मेहर जाति के अधिकांश लोग  भूमिहीन एवं श्रमिक हैं। मेहर पुरूष पारंपरिक रूप से कृषि उपयोगी चमड़े का कार्य तथा महिलाएॅं दाई का कार्य करती हैं,किंतु इनके प्रति गैर अनुसूचित जातियों के द्वारा अस्पृश्यता का व्यवहार के कारण ये लोग इस कार्य से विमुख हो रहे हैं। यह जाति छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों में पाई जाती है, किंतु पूर्व शोधकत्र्ताओं द्वारा इनका वितरण बस्तर एवं उड़ीसा में उल्लेखित होने से इनके समक्ष अपनी पहचान की मुख्य समस्या है, जिसके परिणामस्वरूप यह जाति शासकीय लाभ एवं समाज की मुख्य धारा में जुड़ने से वंचित हैं।

 

सुझावरू

मेहर जाति के अनेक परिवार पारम्परिक व्यवसाय में संलग्न है इस लिए राज्य सरकार के पास इन लोगों को कृषि भिन्न व्यवसायों में नियोजित करने का समभाज्य विकल्प है। लेकिन उनके पारम्परिक व्यवसायों के सुनियोजित विकास के पर्याप्त विकास नही किए गए हैं, जिससे कि उन्हे मौजूदा स्थितियों में प्रतियोगात्मक एवं आकर्षक बनाया जा सके। अतः मेहर जाति के पारम्परिक व्यवसाय के बारे में प्रशिक्षण देकर व्यवसाय के बारे में सहकारीकरण कर उनका बेहतर गठन हेतु कदम उठाने चाहिए।

 

संदर्भ सूचीरू

1ण्   “निर्धनता उन्मूलन एवं ग्रामीण विकास”,जयपुर,पोईन्टर पब्लिशर्स,2001.

2ण्   “भारत में समाज कल्याण प्रशासन”,इलाहाबाद,किताब महल,2003.

3ण्   “ग्रामीण विकास एवं संरचनात्मक परिवर्तन” ,नई दिल्ली,रावत पब्लिकेशन,2000.

4ण्   ”ग्रामीण विकास में प्रमुख शासकीय योजनाओं और बैंकों की भूमिका”   का मूल्यांकन ,पं. रविशंकर शुक्ल वि.वि.रायपुर को प्रस्तुत अप्रकाशित शोध प्रबंध,2000.

5ण्   “शिवनाथ बेसिन में अनुसूचित जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति” ,प्रोसिडिंग्स आॅफ सेकेण्ड इंटरनेशनल ज्याग्रफर्स मीट,2006, गोवा

 

Received on 13.05.2009

Accepted on 10.06.2009     

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Research J.  of Humanities and Social Sciences. 1(1): Jan.-March 2010, 21-23